वो नाटक सोने का करती है

 कुछ तो है अफ़सोस वो जिसे खोने का करती है,

दावा वो मग़र हाँ फिर भी ख़ुश होने का करती है,

मेरी और उसकी रातों में फ़क़त फ़र्क है इतना,

मैं खुलकर जाग सकता हूँ, वो नाटक सोने का करती है... ~आशु


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