सफर
ये सफर भी इंसान की कैसी है मजबूरी,
उसको ये भी ज़रूरी है, उसको वो भी ज़रूरी,
थक हार कर जब बैठता है सोचता है वो,
घर से भी बहुत दूरी है, मज़िल से भी दूरी,
वो फटी पुरानी एक फ़ेहरिश्त ख्वाब की,
ये ख़्वाहिश भी अधूरी है, वो ख्वाहिश भी अधूरी... आशु
ये सफर भी इंसान की कैसी है मजबूरी,
उसको ये भी ज़रूरी है, उसको वो भी ज़रूरी,
थक हार कर जब बैठता है सोचता है वो,
घर से भी बहुत दूरी है, मज़िल से भी दूरी,
वो फटी पुरानी एक फ़ेहरिश्त ख्वाब की,
ये ख़्वाहिश भी अधूरी है, वो ख्वाहिश भी अधूरी... आशु
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