अपनी राह के काँटे भी हटाये होते
अपनी राह के काँटे भी हटाये होते,
जो इतनी शिद्दत से लोगों ने ना बिछाये होते।
लोगों ने जाने की राहें ही बस आसान रखी,
वरना हम तो ऐसे भी थे कि लौटकर आये होते।
वो तो ऐसा है कि घर की याद सताती ही नहीं,
जो शहर में ना इतने मंहगे किराये होते।
दिमाग से काम लेता, दिल की मैं सुनता ही नहीं,
जो चंद आंसू तुमने आंखों से ना गिराए होते।
अब अपनों में गैरों को ढूंढता हूँ मैं,
ये ना होता, गर तुम भी पराये होते । ~आशु
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