माँ एक रूप अनेक

 वो गुस्सा भी करती है, वो अच्छी भी बन जाती है,

सुबह उठाने को मुझको, वो बच्ची भी बन जाती है,
सबसे पहले उठती है वो, kitchen में वो लग जाती है,
फिर पापा को बड़े प्यार से चाय के साथ जगती है,
मुझको वो तैयार करे, फिर बस तक वो पहुंचाती है,
मेरी मम्मी सुबह सुबह, super woman बन जाती है,
दादा जी को सही समय पर दवा की याद दिलाती है,
दादी जी कुछ भी मांगे तो सरपट दौड़ लगाती है,
वो सबका ध्यान रखे, चाहे खुद बीमार हो जाती है,
मेरी मम्मी रोज़ यहां कितने किरदार निभाती है,
सबका दिल खुश रखने को वो, झूठी सच्ची बन जाती है,
सुबह उठाने को मुझको वो बच्ची भी बन जाती है! ~आशु

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