उसकी हर नज़र में पहला रहा हूँ मैं
फिर हाथ फेर दिल को सहला रहा हूँ मैं,
कुछ भी बातें बनाके बहला रहा हूँ मैं!
कहता तो हूँ कि हर आदमी मौका परस्त नहीं,
ये भी क्या गलतफहमियां फैला रहा हूँ मैं!
इस आस में कि मुझमें ज़रा बचपन बचा रहे,
अपनी उंगली थाम, खुद को, टहला रहा हूँ मैं!
मोहब्बत हो या कि नफरत, पर इक हैसियत तो है,
उसकी हर नज़र में पहला रहा हूँ मैं! ~आशु
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