Posts

माँ

  पिता हूँ मैं जो अपने बच्चे की जाँ हूँ, जो रूह में बस पायूँ तो माँ हूँ! कमाकर दो निवाले जो लाया तो पिता हूँ, अपने हाथों से खिला दूं तो माँ हूँ। ज़ज़्वा-ए-तरक्की उसमें जगा दूं तो पिता हूँ, हारकर भी जो आगे बढ़ना सिखा दूं तो माँ हूँ। उंगली पकड़ कर चलना सिखा दूं तो पिता हूँ, हाथ पकड़ के लिखना सिखा दूं तो माँ हूँ। गिरकर उठना जो सिखा दूं तो पिता हूँ, चोट पर मरहम लगा दूं तो माँ हूँ। उसको गर सभ्य बना दूं तो पिता हूँ, जो अच्छा इंसान भी बना दूं तो माँ हूँ। ~आशु~

बता दूं?

  मैं अपने घर का तुझको क्या पता दूं, ठिकाना और भी कुछ है....बता दूं?? वो गुज़रा जो इधर से तो सोचा मिलता चलूँ, बहाना और भी कुछ है....बता दूं?? वो अपने, पराये, वो दुश्मन, वो यार मेरे, ज़माना और भी कुछ है...बता दूं?? वो अच्छा है क्योंकि वो इंसान भला है, पैमाना और भी कुछ है...बता दूं?? जो ला सको तो मेरा बचपन लिए आना, मंगाना और भी कुछ है....बता दूं?? ~आशु~

उसकी हर नज़र में पहला रहा हूँ मैं

  फिर हाथ फेर दिल को सहला रहा हूँ मैं, कुछ भी बातें बनाके बहला रहा हूँ मैं! कहता तो हूँ कि हर आदमी मौका परस्त नहीं, ये भी क्या गलतफहमियां फैला रहा हूँ मैं! इस आस में कि मुझमें ज़रा बचपन बचा रहे, अपनी उंगली थाम, खुद को, टहला रहा हूँ मैं! मोहब्बत हो या कि नफरत, पर इक हैसियत तो है, उसकी हर नज़र में पहला रहा हूँ मैं! ~आशु

आज मेरा भी ईमान सस्ता हो गया होता

  आज मेरा भी ईमान सस्ता हो गया होता, जो बस इक झूठ कह देता, फ़रिश्ता हो गया होता! जो बीमार होते थे, तो घर में ही इलाज होता था, वरना हकीम की बेटी से रिश्ता हो गया होता ! भरी महफ़िल में उसने मुझसे वो सवाल कर लिया, हंसी में ना उड़ाता तो किस्सा हो गया होता ! वक़्त की नज़ाकत से बदलते रहे हैं लोग, किसको पता कौन किसका हो गया होता ! ~आशु

अपनी राह के काँटे भी हटाये होते

  अपनी राह के काँटे भी हटाये होते, जो इतनी शिद्दत से लोगों ने ना बिछाये होते। लोगों ने जाने की राहें ही बस आसान रखी, वरना हम तो ऐसे भी थे कि लौटकर आये होते। वो तो ऐसा है कि घर की याद सताती ही नहीं, जो शहर में ना इतने मंहगे किराये होते। दिमाग से काम लेता, दिल की मैं सुनता ही नहीं, जो चंद आंसू तुमने आंखों से ना गिराए होते। अब अपनों में गैरों को ढूंढता हूँ मैं, ये ना होता, गर तुम भी पराये होते । ~आशु