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माँ एक रूप अनेक

  वो गुस्सा भी करती है, वो अच्छी भी बन जाती है, सुबह उठाने को मुझको, वो बच्ची भी बन जाती है, सबसे पहले उठती है वो, kitchen में वो लग जाती है, फिर पापा को बड़े प्यार से चाय के साथ जगती है, मुझको वो तैयार करे, फिर बस तक वो पहुंचाती है, मेरी मम्मी सुबह सुबह, super woman बन जाती है, दादा जी को सही समय पर दवा की याद दिलाती है, दादी जी कुछ भी मांगे तो सरपट दौड़ लगाती है, वो सबका ध्यान रखे, चाहे खुद बीमार हो जाती है, मेरी मम्मी रोज़ यहां कितने किरदार निभाती है, सबका दिल खुश रखने को वो, झूठी सच्ची बन जाती है, सुबह उठाने को मुझको वो बच्ची भी बन जाती है! ~आशु

अपनी ही मस्त चाल एक बचपन में होती थी

  अपनी ही मस्त चाल एक बचपन में होती थी, अब हद से ज़्यादा हम संभल के चलते हैं! एक दौर था जब छत से बेखौफ कूद जाते थे, अब गड्ढा भी आता है तो बचकर निकलते हैं! ~आशु

सफर

 ये सफर भी इंसान की कैसी है मजबूरी, उसको ये भी ज़रूरी है, उसको वो भी ज़रूरी, थक हार कर जब बैठता है सोचता है वो, घर से भी बहुत दूरी है, मज़िल से भी दूरी, वो फटी पुरानी एक फ़ेहरिश्त  ख्वाब की, ये ख़्वाहिश भी अधूरी है, वो ख्वाहिश भी अधूरी... आशु 

तो क्या हुआ

  जो भी , जितना भी मुझे हासिल हुआ, कहीं तो काम करती होगी तेरी दुआ, आँखें बंद करके महसूस कर सकता हूँ तुझे, जो तो नहीं भी पास, तो क्या हुआ... आशु 

लुफ्त ज़िन्दगी का...

 ठगने का मज़ा है तो ठगे जाने का मज़ा भी है, ज़िन्दगी खूबसूरत है, ज़माने का मज़ा भी है, पहनकर देखना वो कपडे जो अब तंग हो चले, पुराने कोट में एक नोट मिल जाने का मज़ा भी है, यूँ तो दौर नहीं अब रूठने का मनाने का, गर वो रूठे तो फिर मनाने का मजा भी है, जन्नत क्या है कि इक महफ़िल हो ग़ज़लों से बंधी हुई, फटी आवाज़ में तबियत से गाने का मज़ा भी है, तमन्ना जीत जाने की है, दिल में, ज़माने से, एक बच्चे से मगर हार जाने का मज़ा भी है, लुफ्त मंज़िल पर भी पहुँचने का उठाएंगे इक दिन, सफर के मौसमों से दिल लगाने का मज़ा भी है...  - आशु