माँ
पिता हूँ मैं जो अपने बच्चे की जाँ हूँ, जो रूह में बस पायूँ तो माँ हूँ! कमाकर दो निवाले जो लाया तो पिता हूँ, अपने हाथों से खिला दूं तो माँ हूँ। ज़ज़्वा-ए-तरक्की उसमें जगा दूं तो पिता हूँ, हारकर भी जो आगे बढ़ना सिखा दूं तो माँ हूँ। उंगली पकड़ कर चलना सिखा दूं तो पिता हूँ, हाथ पकड़ के लिखना सिखा दूं तो माँ हूँ। गिरकर उठना जो सिखा दूं तो पिता हूँ, चोट पर मरहम लगा दूं तो माँ हूँ। उसको गर सभ्य बना दूं तो पिता हूँ, जो अच्छा इंसान भी बना दूं तो माँ हूँ। ~आशु~